Monday, August 31, 2009



सादगी....



कुछ बातों को व्यक्त करना, कहना या लिखना सहज नहीं होता, शायद "सादगी" भी इन्हीं में शामिल हैं।













क्या यह तस्वीर वह सब बातें नहीं कहतीं जो हम "सादगी" के बारें में महसूस कर सकें, उसे जी सकें।


आज ज्यादा नहीं लिख पाएंगे बस महसूस करना चाहेंगे।


सच कहना चाहेंगे कल यात्रा करतें हुए ऐसी ही "सादगी" हमनें देखीं।


क्या इसे हम कभी व्यक्त कर सकतें हैं ?


"सादगी" हमेशा "सादगी" ही होतीं हैं।



सादगी.... बस.... सादगी ही होतीं हैं....

Wednesday, August 26, 2009


आनंद....


आनंद.... जब कोई अपना मीत अपने साथ हो तो आनंद कितना दूर होगा।



आनंद अपने मीत के साथ रहते हुए ही आता हैं।

जो बस हमेशा पास रहें यही इच्छा जिस के प्रति हो वही मीत कहलाता हैं।

मीत के साथ रहतें आनंद दुगना हो जाता हैं।

मीत का साथ होना ही आनंद बन जाता हैं।

इस आनंद की कोई परिसीमा नहीं होतीं हैं।

यह बस हमेशा बना रहता हैं।

इसमें सह-हृदयता होतीं हैं।

इस आनंद में निर्मलता और निष्पापता होतीं हैं।

यह एक मीठा अहसास होता हैं।

इस आनंद में आत्म-मिलन होता हैं।

इस आनंद में एक समदृष्टि बन जाती हैं।

यह आनंद हमेशा छाया हुआ रहता हैं।


आनंद.... आत्मा की निर्मलता....

Tuesday, August 25, 2009


आत्म-सम्मान....


आत्म-सम्मान.... जब कोई हमारें आत्म-सम्मान को बनाए रखें इस से बढ़कर और क्या सम्मान हो सकता हैं।


आत्म-सम्मान से हमारीं पहचान बनतीं हैं।

बल्कि आत्म-सम्मान ही हमारीं पहचान बनाता तथा बढाता हैं।

आत्म-सम्मान से हमें आत्मविश्वास मिलता हैं।

जब कोई हमारें आत्म-सम्मान की रक्षा करता हैं तो हमारें साथ साथ वह अपना सम्मान और गौरव भी बढाता हैं।

आत्म-सम्मान में स्वाभिमान झलकता हैं।
आत्म-सम्मान में एक विश्वास दिखाई देता हैं।
आत्म-सम्मान से एक बंधन जुड़ता हैं।

आत्म-सम्मान हमारीं सही पहचान कराता हैं।

आत्म-सम्मान में एक तेज होता हैं जो सिर्फ़ महसूस किया जा सकता हैं।


आत्म-सम्मान.... हमारीं सच्ची पहचान....

Monday, August 24, 2009


बंधन....


बंधन.... एक विश्वास होता हैं, एक इज्ज़त होतीं हैं।



बंधन एक डोर होतीं हैं जो आत्मसम्मान से पहनाई तथा सजायी जाती हैं।

बंधन में एक विश्वास होता हैं जो इस बंधन को बांधें रखता हैं और आगे बढ़ता हैं।

बंधन आत्मा से जुड़ता हैं।

बंधन से हम एक दूजे पर निर्भर हो जातें हैं।

बंधन से एक दूजे को सम्मान दिया जाता हैं, एक दूजे पर भरोसा किया जाता हैं।

बंधन में एक प्यार होता हैं, एक मिठास होतीं हैं।

यह एक प्यारा एहसास होता हैं।

इसमें मैत्रीं होतीं हैं, इस रिश्तें में गहराई होतीं हैं।

इस रिश्तें में एक दिशा होतीं हैं जो हमेशा इस रिश्तें को मजबूत बनातीं हैं।


बंधन.... जिंदगी की एक अनोखी शुरुआत....

Thursday, August 20, 2009



मीत....



मीत....दिल की हर बात जो सहज रूप से समझ जाए।














अपने मीत को कोई बात कहने या समझाने की कभी ज़रूरत ही कहाँ पड़तीं हैं।


वह तो हर बात अपने दिल से, अपनी आत्मा से समझ जाता हैं।


आँखें हर बात अपने मीत से खुलकर तथा निर्मलता से कह देतीं हैं।


और मीत वह हर बात आसानी से पढ़ तथा समझ लेता हैं।


इसमें शब्द कम और आँखें तथा साँसे ज्यादा बोलतीं हैं।


इसमें हर नाता आत्मा से जूडा हुआ होता हैं।


मीत जैसे हमारा ही प्रतिबिम्ब होता हैं।


इस रिश्तें में हमेशा एक मिठास सी होतीं हैं।


मीत हमारीं हर बात कहने से पहले ही उसे जान लेता हैं।


मीत के साथ रहतें हुए हमेशा अपनापन लगता हैं।


मीत हमें अच्छी तरह जानता हैं।


मीत की हर बात में मिठास होतीं हैं।


मीत का सानिध्य हमेशा अपनासा लगता हैं।


मीत हमेशा साथ रहें, हमेशा पास रहें यहीं इच्छा होतीं हैं।


मीत हमेशा मीठा अहसास होता हैं।



मीत.... हमारा प्यारासा प्रतिबिम्ब....

Wednesday, August 19, 2009



प्रार्थना....



प्रार्थना.... मन तथा ह्रदय को पवित्र करती तथा पवित्र रखतीं हैं।






प्रार्थना से मन पवित्र बनता हैं।


प्रार्थना से मन सात्विक बनता हैं तथा मन की सात्विकता बनीं रहतीं हैं।


प्रार्थना से मन के विचार शुद्ध बनते हैं।


प्रार्थना से ह्रदय प्रफुल्लित बनता हैं तथा मस्तिष्क में शीतलता एवं शांतता आतीं हैं।


प्रार्थना मन में उच्च विचार लाती हैं।


प्रार्थना से आत्मिक संतोष मिलता हैं।


प्रार्थना से शुभ विचार मन में रहतें हैं।


प्रार्थना से जीवन में सात्विकता आने लगतीं हैं।


प्रार्थना से मन, ह्रदय तथा आत्मा प्रसन्न रहतें हैं


प्रार्थना से जीवन में उज्वलता आतीं हैं।


प्रार्थना से जीवन प्रकाशित हो उठता हैं।



प्रार्थना.... सभी सात्विक गुणों की शुरुआत....

Tuesday, August 18, 2009



खुशीं....


खुशीं.... आत्मा की प्रसन्नता होतीं हैं।









खुशीं.... जब हर घटना जो आत्मा चाहती हो और उस के अनुरूप वह घट जाए तब खुशीं की असली बुहार देखनें मिलतीं हैं।


खुशीं में हमेशा असलियत छुपीं होतीं हैं।


जो भी बात जब आत्मा चाहे तो वह बात शुभ एवं प्रसन्नदायक होतीं हैं।


इसीलिए जब आत्मा ने चाही हुई घटना जब घटतीं हैं तब खुशीं की बौछार उमड़ उठातीं हैं।


आत्मा की इच्छा पवित्र होतीं हैं।


इसमें प्रसन्नता झलकती हैं।


खुशीं हमेशा मासूम होतीं हैं।


खुशीं हमेशा हर बात से परें होतीं हैं।


खुशीं हमेशा निर्मल होतीं हैं।




खुशीं.... आत्मा की प्रसन्नता....

Monday, August 17, 2009



देखभाल....



देखभाल.... अपने मीत के लिए, अपने साथी के लिए आत्मा से निकलीं हुई परवाह की भावना होतीं हैं।


इसमें आत्मीयता होतीं हैं।


इसमें उमंग और उत्साह होता हैं।


इसमें लगाव होता हैं।


इसमें प्रतिबद्धता होतीं हैं।


इसमें महत्ता होतीं हैं।


इसमें प्रेम, आदर तथा सम्मान होता हैं।


इसमें आत्मिक लगाव होता हैं।



देखभाल.... एक प्यारी सी आत्मभावना....

Saturday, August 15, 2009



साथी....



साथी.... जिंदगी की एक ज़रूरत।









हर एक रिश्ता जो आत्मा से बनता हो वह "साथी" कहलाता हैं।


यह एक प्रतिबद्ध रिश्ता होता हैं।


इसमें एक नाता होता हैं जो हमेशा निभाया जाता हैं।


इसमें एक दूजे के प्रति स्नेह तथा ममता होतीं हैं।


इसमें एक दूजे के प्रति आदर तथा सम्मान होता हैं।


इस रिश्तें में गहराई होतीं हैं जो धीरे-धीरे बढ़तीं जाती हैं।


इसमें समर्पण भाव नैसर्गिक रूप से होता हैं।


अपने से पहले दूजे के प्रति जादा देखभाल की भावना होतीं हैं।


इस रिश्तें में प्रेम होता हैं।


इस रिश्तें में आतुरता होतीं हैं।


इस रिश्तें में सत्यता तथा गंभीरता होतीं हैं।


इस रिश्तें में अपनापन होता हैं।


इसमें भावुकता होतीं हैं।


इस रिश्तें में त्याग की भावना आत्मा से निकलतीं हैं।


इस रिश्तें में मित्रता होतीं हैं।


इस रिश्तें में प्यार होता हैं।


इसमें आत्मसंबंध होता हैं।


सबसे महत्वपूर्ण इसमें "विश्वास" नैसर्गिक रूप से होता हैं।


इसमें एकता होतीं हैं।


इस रिश्तें में जान होतीं हैं।


इसमें एक दूजे के प्रति मिठास होतीं हैं।


इस रिश्तें में मीठापन होता हैं।




साथी.... जिंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत....

Wednesday, August 12, 2009



दर्पण....



दर्पण अपने विचारों का प्रतिबिम्ब होता हैं।






दर्पण हमेशा विचारों के अनुकूल ही प्रतिबिम्ब दिखाता हैं।


दर्पण में प्रतिमाएं होती हैं, वह प्रतिमाएं जो हमारें विचारों को दर्शातीं हैं।


जैसे विचार होतें हैं उन्हीं के अनुरूप प्रतिमाएं दर्पण में दिखतीं हैं।


ये प्रतिमाएं नैसर्गिक होतीं हैं।


आत्मा की छबि विचारों के द्वारा दर्पण से प्रकट होतीं हैं।


आत्मा तो सहज रूप से विचारों को प्रकट कर देती हैं।



दर्पण.... आत्मा का विचारों द्वारा प्रकट होने वाला प्रतिबिम्ब....

Tuesday, August 11, 2009



साथ....



साथ.... एक इच्छा और एक ज़रूरत भी।








साथ आत्मा की अनुमति के बाद ही बनता हैं।


साथ में आत्मा की इच्छा और अनुमति दोनों की ज़रूरत होतीं हैं।


साथ.... एक मीठा और सुहावना सफर होता हैं।


साथ.... में एक मिठास और प्रेम दोनों होतें हैं।


साथ.... में अपनापन होता हैं।


इसमें आत्मा का एक अद्भुत रिश्ता होता हैं।


इसमें देखभाल भी साथ साथ चलतीं हैं।


इसमें लज्जा भी होतीं हैं।



साथ.... बस.... एक साथ होता हैं....

Monday, August 10, 2009



प्रेम....



एक प्यारी सी मिठास एक प्यारी सी मुस्कान के लिए.... हाँ.... बस.... यहीं हैं "प्रेम"।




जब रिश्ता आत्मा से बनता हो और उस आत्मा की आवाज़ जब आखों से गूंजती हुई ह्रदय में जाकर ज़ोर से कुछ स्पंदन कर रहीं हो, कुछ कह रही हों तो बस.... समझ लीजिए की प्यार की बरसात शुरू हो गई हैं।


जब उस मीठी मुस्कान की वजह से हर बात में जब मिठास आने लगें तो बस यही प्यार हैं।


जब वह मीठी मुस्कान हमेशा पास रहने का दिल और मन दोनों.... हाँ.... जी.... हाँ.... जब दिल और मन दोनों करें तब वही प्यार हैं।


हमेशा वह मीठी मुस्कान बस.... पास रहें यहीं आत्मा जब चाहें तब जान लेने की ज़रूरत ही कहाँ पड़तीं हैं क्यों की तब यह सब बातें समजने के लिए मन कहा खालीं होता हैं।


सब कुछ एक ही लगने लगता हैं।


उस मुस्कान की मिठास आत्मा पर कब के अपने रंग उडेल चुकी होतीं हैं।


बस.... वह मिठास ही मिठास दिखनें तथा महसूस होनें लगतीं हैं।


इसी के साथ "देखभाल" भी अपना दामन "प्यार" से जोड़ लेतीं हैं।


बस..... अब बाकी बातें महसूस कर लो....


यही प्यार के प्रति स्नेह होगा, उस मिठीसी मुस्कान के प्रति प्यार होगा।





प्यार.... बस.... महसूस कर लीजिए....

Friday, August 7, 2009



भूतकाल से सीखना....


भूतकाल से सीखना.... इन्सान को मिलीं एक बहोत बड़ी ताकद और एक बहोत बड़ा वरदान हैं।




अपने अतीत को, अपने भूतकाल को याद कर पाना, यानि बीती जिन्दगी को फिर से दोबारा जीने का मौका मिलना एक वरदान ही तो हैं।


भूतकाल से सीखना यानि सोने की खान मिलने के बराबर हैं।


यह वो चीज़ हैं जो भूतकाल में की हुई गलतियों पर विचार कर के अपने मंझिल के प्रति आगे बढ़ा जाए।


जब वर्तमान काल में हो रहीं गलतियाँ कम ना हो रहीं हो तो यह वह समय हैं जब भूतकाल से बहोत कुछ सिखा जा सकता हैं।


भूतकाल हमारें निकटतम मित्र की तरह होता हैं, जो हमें मुश्किल समय में सही राह दिखा कर आगे बढ़नें में मदद कर सकता हैं।


भूतकाल से सीखनें को मिलना यानि परिस मिलनें के बराबर हैं, यह मुश्किलों को आसन तो नहीं करता, पर हाँ, मुश्किलों से उभर कर उन से लड़ने ताकद ज़रूर देता हैं जो एक महत्वपूर्ण लडाई लड़ने के लिए काफी हैं।



भूतकाल से सीखना.... विकसित बनने के प्रति बढाया हुआ पहला कदम....

Wednesday, August 5, 2009



नायक....



नायक.... किसे कहा जा सकता हैं नायक....





सिर्फ़ उसे जिसमें हर परिस्थिति का सामना करने की तैयारीं हैं, भावना हैं....


जब यह भावना होतीं हैं तो ऐसे परिस्थिति से सामना करने की ताकद और हिम्मत अपने आप जाती हैं।


नायक.... एक अनुभव का भंडार होता हैं।


नायक.... परिस्थिति के हर रंग तथा पहलु को जान तथा जी चुका होता हैं।


एक नायक के लिए ख़ुद के प्रति इमानदार होना बहोत ज़रूरी होता हैं।


नायक परिस्थितियों से अपने आप बन तथा सवर जातें हैं।


एक नायक की इच्छा ही परिस्थितियों का रंग-ढंग बदल देतीं हैं।




नायक.... परिस्थितियों ने बनाया हुआ एक अद्भुत हिरा....

Monday, August 3, 2009



जीत के प्रति इंतजार तथा संयम....



यह एक संयम की भावना होतीं हैं।







आत्मविश्वास के साथ साथ संयम का होना भी आवश्यक हैं।


हर बात को संयम ही तो आगे ले जाता हैं।


इंतजार.... संयम का एक भाग होता हैं।


संयम ही आत्मविश्वास को जीत के प्रति आगे बढाता हैं।


संयम एकाग्रता बढाता तथा बनाए रखता हैं।


संयम से एकाग्रता बढ़तीं तथा संदिग्धता घटतीं हैं।


संयम से लक्ष्य पर ध्यान बने रहता हैं।




संयम.... लक्ष्य के प्रति ले जाने वाला एक अच्छा तथा सच्चा मित्र....

Friday, July 31, 2009



जीत....



जीत.... आत्मा के अन्दर धगधगती हुई आग होतीं हैं।







जब कर के दिखाना ही सब कुछ बन जाता हैं, जो अन्दर ही अन्दर बहोत समय से सुलगती हुई आग जब बहोत ताकद और आत्मविश्वास से बाहर आतीं हैं वो "जीत" ही होतीं हैं।


जीत.... एक संयम का परिणाम होतीं हैं, जीत.... एक तपस्या का परिणाम होतीं हैं।


जब सब कुछ, हर एक बात आत्मा से निकलती हैं, अपने ही जोश के साथ जब आगे बढ़तीं हैं, तब वो हर बात जीत का रूप लें लेतीं हैं।


जीत.... एक दृष्टिकोण का परिणाम होतीं हैं।


जीत.... लक्ष्य के प्रति बढाया हुआ हर सफलतम कदम का परिणाम होतीं हैं।


जीत.... ध्यान बनाए रखनें का परिणाम होतीं हैं।




जीत.... आत्मा की गहरीं तथा प्रबल इच्छा....

Thursday, July 30, 2009



शिक्षा....



शिक्षा.... मनुष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग होता हैं।












जीवन का पाठ हमेशा पढ़ा जाता हैं ना की पढाया जाता हैं।


लेकिन हाँ जब कभी किसी लायक मनुष्य से कुछ सिखने मिलें तो उसे सिख लेना चाहिए।


शिक्षा जब कभी भी, जहाँ कहीं पर भी मिलें मनुष्य ने उसे सिख लेना चाहिए।


जब हमें शिक्षा मिल रहीं हों तो हमें इसे हमारा सदभाग्य समझ लेना चाहिए।


जब शिक्षा मिल रहीं हों तो उसे ध्यान से और समतोल मन से समझ तथा सिख लेना चाहिए।


शिक्षा मिलना यह हमारा महत्भाग्यहोता हैं।


शिक्षा देने वाला हमारें दोषों को घटाता नही बल्कि हमारें गुणों को बढाता हैं, ऐसे गुणों को जिससे हम हमारें दोषों को मिटा सकें।


हमारें दोष हमें ही मिटानें होतें हैं। शिक्षा देने वाला तो हम में वो ताकद बढ़ा देता हैं जिससे हम ख़ुद हमारें दोषों को जान सकें और उन्हें मिटा सकें।


किसी समस्या को सुलझानें का एक बहोत ही सरल उपाय यह हैं की उस समस्या को अच्छी तरह और पुरी तरह जान ले की असल में समस्या क्या हैं।


अगर यह हम पुरी आत्मीयता से करलें तो उपाय अपने आप सामने आ जाएगा। फिर तो ना उपाय ढूँढना पड़ेगा और ना उसके प्रति कोई कष्ट उठाना पड़ेगा।


बस.... समस्या क्या हैं यह अच्छी तरह जान तथा पहचान लें।


कोई चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न करें हमारें दोषों को मिटा नहीं सकता।


हमारें दोष हमें ही मिटानें होतें हैं। क्यों की हम ही वो व्यक्ति होतें हैं जो अपने आप को औरों से ज्यादा भली भांति जानते हैं।



शिक्षा.... मनुष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग....

Wednesday, July 29, 2009



तैयारी....



कुछ पाने की इच्छा होना और उस के लिए शुरुवात करना तैयारी कहलाती हैं।







इसमें इच्छा होतीं हैं। इसमें दृढ़ निश्चय होता हैं।


इसमें विजय पाने की चाहत होतीं हैं।


इसमें विजय पाने के प्रति समर्पण होता हैं।


इसमें खुशी होतीं हैं। इसमें आत्मविश्वास होता हैं।


इसमें आत्मा का दर्पण झलकता हैं।


तैयारी आत्मा की अंदरूनी इच्छा तथा चाहत होतीं हैं।


इसमें ध्यान सीधा मंजिल पर होता हैं।


इसमें जीतना ही लक्ष होता हैं।


इसमें हर बात के लिए मानसिक तथा शरीरिक संतुलन बनाया जाता हैं।


तैयारी हर चीज़ की जान होतीं हैं।



तैयारी.... एक दृष्टिकोण.....

Tuesday, July 28, 2009



प्रशिक्षक....



प्रशिक्षक बनने की इच्छा करें तो अच्छें खिलाड़ी अपने आप बन जाओगे।






अगर अच्छा नायक बनने की इच्छा हो तो अच्छा अनुयायी बनने की कोशिश करें।


प्रशिक्षक एक अनुभव होता हैं। हमारीं खामियों तथा त्रुटियों को प्रशिक्षक अच्छीं तरह जान तथा पहचान सकता हैं।


हमारें अन्दर सो रहे स्वत्व को प्रशिक्षक जगा सकता हैं।


हमारीं खूबियों को ताकद में बदलना प्रशिक्षक अच्छीं तरह जानता हैं।


प्रशिक्षक का ध्यान ऊपर से निचे की ओर होता हैं, जबकि एक खिलाड़ी का ध्यान निचे से ऊपर की ओर होता हैं।


प्रशिक्षक हर बात को आसानी से भाप सकता हैं।


प्रशिक्षक शिस्त होता हैं। प्रशिक्षक खिलाड़ियों की प्रति नहीं बल्कि ख़ुद के प्रति कठोर होता हैं।


इसीलिए कोई निर्णय लेते हुए उसे सबसे पहले अपने प्रति कठोर बनना पड़ता हैं।


प्रशिक्षक हमारा सबसे पहला शुभचिंतक होता हैं।


माता पिता के बाद प्रशिक्षक का ही मान होता हैं। माता पिता भी प्रशिक्षक का रूप हो सकतें हैं।



प्रशिक्षक.... हमारीं जिंदगी का शिल्पकार....

Monday, July 27, 2009




ताड़ना....













किसी बात को सही तरीके से पहचानना "ताड़ना" कहलाता हैं।




सही ढंग से और पूर्णता युक्त तरीके से महसूस करना "ताड़ना" कहलाता हैं।



"ताड़ना" एक कसब हैं, एक कौशल्य हैं।



इसे सही तरीके से जानना तथा महसूस करना ज़रूरी होता हैं।



इसमें नज़र होतीं हैं। इसमें देखना और समझना बहोत महत्वपूर्ण होता हैं।



इसमें प्रामाणिकता होतीं हैं। "ताड़ना" एक क्रिया होती हैं।



निर्णय लेने में ताड़ने की प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभातीं हैं।





"ताड़ना".... एक बहोत ही महत्वपूर्ण कौशल्य....

Sunday, July 26, 2009



चक दे....



चक दे.... इस शब्द में बहोत ताकद हैं।


पुरी तरह शक्ति से भरा हुआ हैं ये शब्द।



इसमें निश्चय हैं।

इसमें पुरा समर्पण हैं।

ये ताकद हैं। ये हिम्मत हैं। ये आत्मविश्वास हैं।


ये निडर हैं। इसमें सबसे खास.... आदर हैं। इसमे इज्जत हैं। इसमें मन और दिमाग का समतोल हैं।


इसमें शिस्त हैं। इसमें कदर हैं। इसमें पूर्णता का निश्चय हैं।


इसमें सहनशक्ति हैं। इसमें धेर्य हैं।


इसमें प्रमाणिकता हैं।



चक दे..... बस... चक दे..... और कुछ नहीं.....

Thursday, July 23, 2009



आदर्श....



आदर्श.... मन का एक लक्ष्य।


आदर्श मन का समर्पण होता हैं।


आदर्श आत्मा का केन्द्र होता हैं। आत्मा का प्रतिबिम्ब होता हैं आदर्श।


आदर्श परिश्रम होता हैं। आदर्श लगन होता हैं। आदर्श मन की प्रेरणा होता हैं।


आदर्श मन का केंद्रबिंदु होता हैं।


आदर्श एक स्वाभिमान होता हैं। आदर्श एक दृढ़ निश्चय होता हैं।


आदर्श एक सपना होता हैं।


आदर्श एक जीवन होता हैं। आदर्श एक स्थाई रूप होता हैं।


आदर्श जीवन का एक सपना होता हैं।


आदर्श हमारीं जिंदगी होता हैं।



आदर्श.... मन और आत्मा का स्थाई बिन्दु....


Wednesday, July 22, 2009



दूरदृष्टि....




दूरदृष्टि.... एक दूर की सोच होतीं हैं ।



एक अथांग समझ होतीं हैं। इसमें परिपक्वता होतीं हैं, इसमें गहराई होतीं हैं।


इसमें परिणाम को देखनें की तथा समझनें की दृष्टी होतीं हैं।


दूरदृष्टि में सुरक्षितता छुपीं होतीं हैं। इसमें विजय की भावना होतीं हैं।


इसमें गहरीं सहनशीलता होतीं हैं। इसमें सच्चाई होतीं हैं।


इसमें हर कार्य की रूपरेखा होतीं हैं।


दूरदृष्टि परिस्थितियों पर निर्भर करतीं हैं।


जब विजय की भावना आत्मा से आ रही हो तो दूरदृष्टि अपने आप अपना कार्य करनें लगतीं हैं।




दूरदृष्टि.... आत्मा में विजय की भावना का आभास....

Tuesday, July 21, 2009



मन के रंग....



मन के रंग.... कैसे होतें हैं कभी कोशिश की हैं देखनें की या महसूस करनें की ?



मन के रंग.... ज्यादातर तो परिस्थितियों पर ही निर्भर करतें हैं।



आज अगर हम खुश हैं तो मन के रंग भी इन्द्र धनुष्य की तरह चमक तथा खिल उठातें हैं।



मन के रंगों की असली उड़ान और बरसात तो बचपन में ही देखनें मिलतीं हैं।



हर चीज़ में सच्चाई, मिठास और अपनापन होता हैं। बचपन में हम सब खुशी का अहसास पाने की तान में तथा पानें की ताक में रहतें हैं। क्या हो अगर हर चीज़ सरल और सुलभ होने लगें तथा दिखनें लगें ?



बचपन.... मन के हर रंग में रंग जाता हैं। इस रंग में रंगने के लिए इसे किसी आमंत्रण की ज़रूरत नहीं पड़तीं।



बस खुशी की एक फुहार मिलीं, खुशी का एक एहसास मिला और बस मन के रंग में रंग गए।



और बचपन माँ की गोद में हो तो........ फिर तो बस..... पूछों मत।



उस समय मन के रंग कैसे होंगे ? महसूस तो कीजिए।




मन के रंग..... बचपन और माँ के प्यार और स्नेह का एक अद्भुत मिलाप....

Monday, July 20, 2009


बचपन....


बचपन.... और क्या कहा जा सकता हैं इसके बारें में।

बस.... महसूस कर लों।

मासूमियत और निष्पापता का पूरा भंडार होता हैं बचपन।

इसमें शुद्धता होतीं हैं, पवित्रता होतीं हैं।

इसमें मिठास होतीं हैं। इसमें अपनापन होता हैं।

इसमें मित्रता होतीं हैं। इसमें जान होतीं हैं। बचपन आत्मा का दर्पण होता हैं।

मन की पवित्रता बचपन में दिखाई देतीं हैं।


बचपन में लगाव होता हैं। बचपन में कदर होतीं हैं।

बचपन में ओढ़ होतीं हैं। इसमें सरलता होतीं हैं।

इसमें स्पष्टता होतीं हैं।


बचपन.... दिल की धड़कन.... दिल की जान....

Saturday, July 18, 2009






शीतलता....





शीतलता.... किसे अच्छी नहीं लगतीं ?



इसमें ठंडक होतीं हैं।



इसमें मधुरता होतीं हैं। इसमें अपनापन होता हैं। इसमें स्वागत छिपा होता हैं।



इसमें मिठास होतीं हैं। यह एक मनभावन भावना होतीं हैं।



यह आत्मा को हमेशा शांत रखती हैं। यह एक मीठी भावना होतीं हैं।



इसमें पवित्रता होतीं हैं। इसमें आत्मा की स्थिरता देखनें मिलतीं हैं।



शीतलता हमेशा स्थैर्य होतीं हैं। इसमें आत्मा की खुशी झलकतीं हैं।



इसमें एकांत देखने मिलता हैं। इसमें शांतता होतीं हैं।





शीतलता.... आत्मा का एक कोमल एहसास....



Friday, July 17, 2009




मुस्कुराहट....




मुस्कुराहट.... एक मीठी सी भावना होतीं हैं।


मुस्कुराहट.... हमेशा अंदरूनी खुशी होती हैं।


इसमें हमेशा निष्पापता होतीं हैं। मुस्कुराहट हमेशा सुंदर और मीठी लगतीं हैं।



इसमें कोमलता की भावना होतीं हैं। खासकर नन्हें बच्चों की मुस्कुराहट.... बस... पूछों मत, एक भगवान की प्रतिमा होतीं हैं।



मुस्कुराहट हमेशा निर्मल तथा मनमोहक होतीं हैं। नन्हें बच्चों को मुस्कुरातें हुए देखें तो उनकी मुस्कुराहट से नज़र नहीं हटतीं।



मुस्कुराहट.... हर भावना से परें होतीं हैं।




मुस्कुराहट... एक मीठापन.... एक मीठी भावना.....

Thursday, July 16, 2009



रोशनी....



रोशनी.... अंधेरे से उजाले की ओर जाने का सुगम तथा सरल माध्यम।


रोशनी सुहावनी होती हैं।


चाँद की रोशनी रात में और सूरज की रोशनी दिन में अपना एक अलग ही महत्त्व रखतीं हैं।


लेकिन मध्यम रोशनी हमेशा प्यारी लगतीं हैं। इस में शीतलता होतीं हैं। इस में मिठास होती हैं।


यह अपने आप ही में अद्भुत होतीं हैं। इस में आकर्षण होता हैं। इसमें कोमलता होतीं हैं।


रोशनी पथ दर्शक होतीं हैं। मंजिल तक पहुँचने का एक माध्यम होतीं हैं।


रोशनी मार्गदर्शक होतीं हैं।



रोशनी.... एक भव्यता और दिव्यता....

Wednesday, July 15, 2009



पथ....



पथ.... जो हमेशा हमें ज़िंदा रखतें हैं।


जो हमें हमारीं मंज़िल तक ले जातें हैं।



पथ... का सफर तो बहोत सुहाना होता हैं।


जिंदगी के हर पहलु को समजने का यह बहोत ही सुगम और सरल मार्ग हैं।


हम जीवन की हर एक बात को पथ के सफर में ही जान तथा समझ सकतें हैं। जब हम पथ पर चलतें हैं तो पथ का सफर हर मोड़ पर अलग सा नज़र आता हैं।


हर मोड़ पर एक अलग ही सुहाना सा दृश्य हमें दिखाई देता हैं। पथ... हमारीं ज़िन्दगी का एक हिस्सा होतें हैं।


जब कभी हमने पथ का साथ चुना हैं हमेशा एक नई मंज़िल को पाया हैं।


इस प्रकार पथ तो हमारें एक अच्छें मित्र साबित होतें हैं। हैं ना ?



पथ....हमारें जीवन के एक सच्चें मित्र......

Tuesday, July 14, 2009






मन के द्वार....




मन के द्वार..... हमेशा एक सुन्दरता की निशानी होतें हैं।



सुन्दरता की झलक मन के द्वार से ही होकर गुजरती हैं।



मन के सारें रंग मन के द्वार पर झिलमिलातें हुए नज़र आतें हैं। क्या कोई जान या महसूस भी कर पता हैं की मन के द्वार कैसे होतें हैं।



सच पूछों तो मन के द्वार हमेशा सुंदर तथा कोमलता के फूलों से सजे हुए होतें हैं। मन के द्वारों से एक अलग सी ही महक आतीं हैं।



मन के द्वार जब कोई अपने मन से देख लेता हैं तो फिर कुछ जानने की या समझने की ज़रूरत ही कहाँ रह जाती हैं।



मन की हर भावना, मन के द्वार पर हमेशा एक दूजे से अपनी बात करती हुई दिखाई देतीं हैं।



क्या मन के द्वार इतने सुंदर होतें हैं ? जी हाँ....





मन के द्वार...... हर शुभ काम की शुरुवात....

Monday, July 13, 2009



प्रतिबिम्ब.....



विचार हमारें प्रतिबिम्ब होतें हैं।

वास्तविकता में आत्मा ही हमारी असली प्रतिबिम्ब होती हैं।



प्रतिबिम्ब हमारी छबि होतें हैं। प्रतिबिम्ब हमारें विचारों के दर्पण होतें हैं।


प्रतिबिम्ब हमें हमारें मूल्य तथा हमारीं त्रुटियां प्रतिबिंबित करतें हैं।


यह एक बहुत ही आश्चर्यजनक बात होती हैं की हम हमारीं प्रतिमा को अपने सामने देख सकतें हैं।


प्रतिबिम्ब हमारी आत्मा के दर्पण होतें हैं। प्रतिबिम्ब में हम अपने वर्तमान को जान सकतें हैं।


प्रतिबिम्ब में हमारीं आत्मा तथा मन की छबि स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।


हमारीं हर बात को हम प्रतिबिम्ब में देख तथा ताड़ सकतें हैं। प्रतिबिम्ब में हमेशा सच्चाई होती हैं।




प्रतिबिम्ब..... हमारीं आत्मा और मन के दर्पण...

Sunday, July 12, 2009



बसंत.....



बसंत...... बस, मन में एक बहार सी आ जाती हैं।


बसंत की बहार ही ऐसी होती है.... की हर कही पर बहार ही बहार नज़र आती हैं।


इस माह में स्वर्ग की झलक सी दिखाई पड़ती हैं। बसंत रुतु सब रुतुओं का राजा कहलाता हैं।


बसंत हर जगह हर तरफ़ एक उमंग और बहार फैलता हुआ आता हैं। मानो सृष्टि ने हर तरफ़ खुशियों की बहार उडेल दी हों। मन तो बसंत में ही पुरी तरह खिलता हैं।


उत्साह और उमंग यह दोनों ही एक साथ चलतें दिखाई देते हैं। आत्मा भी बसंत के बहार में पुरी तरह से भिग जाती हैं।


यह एक नैसर्गिक घटना और नैसर्गिक उमंग होती हैं।


हम इस बसंत में पुरी ज़िन्दगी जी लेतें हैं। हैं ना ?



बसंत..... मन और आत्मा की बहार.....

Wednesday, July 8, 2009



निष्पापता.......



निष्पापता... किसी भाव से अनजान रहना हीं निष्पापता का होना कहलाता हैं।


यह एक बड़ा ही अदभुत दृश कहलाता हैं। निष्पापता बच्चों में नैसर्गिक रूप से होती हैं।


जब बच्चा अपनी माँ से कोई मासूम या अनजान सा सवाल कर रहा हो तो वो दृश आप महसूस कर सकतें हों।


निष्पापता... यह एक भावना रहित भाव का आभास होतीं हैं। इसमें मासूमता तो पुरी तरह भरीं होती हैं। यह एक निष्पाप भावना होती हैं। यह एक सच्ची भावना होती हैं। निष्पापता नैसर्गिक होतीं हैं।


यह अपने आप प्रकट होती हैं। इसमें कोमलता होती हैं। इसमें आदर होता हैं। इसमें प्यार होता हैं।


इसमें मैत्री होतीं हैं। सबसे महत्वपूर्ण इसमें निर्भयता होती हैं। निष्पापता डर से हमेशा परें होती हैं।


इसमें आत्मा का प्रतिबिम्ब प्रकट होता हैं। यह तो आत्मा का सहज रूप से दर्पण होती हैं।



निष्पापता....आत्मा की एकमेव पहचान.....

Tuesday, July 7, 2009



आत्मा....



आत्मा हमारा अस्तित्व होती हैं। आत्मा हमारी सच्चाई होती हैं। आत्मा की आवाज़ ईश्वर की आवाज़ होती हैं।

आत्मा ईश्वर का रूप होती हैं।


आत्मा की भावना प्रबल और जागृत होती हैं। आत्मा से ही हमारे अस्तित्व की पहचान होतीं हैं।


जब कभी निर्णय लेना हो तो आत्मा की आवाज़ सुन लेनी चाहिए। पहली बार देखने पर जो आवाज़ अन्दर से आती हैं वो आत्मा की आवाज़ होती हैं। वो आवाज़ हमेशा सच होती हैं।


आत्मा की सुनकर अगर हम कोई काम करें तो हम सफल होतें हैं। आत्मा हमेशा सही रास्ता दिखाती हैं। आत्मा की आवाज़ सुनकर उसकी रह पर चलने से भय से दूर तथा आत्मविश्वास के साथ चला जा सकता हैं।



आत्मा.... हमारी सच्छी पहचान.....

Monday, July 6, 2009


अकेलापन....



अकेलापन.... एक सबसे अच्छा और सच्छा दोस्त। यह एक बड़ा ही प्यारा दोस्त होता है।

इसके साथ रहते हुए हम कभी अकेलापन महसूस ही नहीं कर पातें।

जब अकेलापन साथ हो तो हम कभी अकेला महसूस नहीं करतें।

यह हमारे अन्दर की खुशी और अपनेपन को बाहर लाता हैं तथा अपने अन्दर छुपें हुए उस खूबी को बाहर लाता हैं जिसे सिर्फ़ अकेलेपन में ही पाया तथा महसूस किया जा सकता हैं।
अकेलेपन में हम अपने आप के सर्वाधिक नज़दीक आतें हैं।


हम ख़ुद को अच्छी तरह महसूस तथा जान पातें हैं। अकेलापन हम से हमारी हर बात बाँटता हैं। यह हमें अंदरूनी खुशी देता हैं।
अकेलेपन में हम ख़ुद को खुश महसूस करतें हैं। अकेलापन एक मीठा अहसास होता हैं।


अकेलेपन में हम ख़ुद के अधिक करीब आतें हैं।



अकेलापन...एक अपना प्यारा दोस्त.....

Sunday, July 5, 2009



उत्सुकता....



मन को भाने (अच्छी लगने) वाली चीज़ के बारें में जानने की उत्कंठा रखना या उत्कंठा होना उत्सुकता कहलाती हैं।


यह ऐसे चीज़ के बारें में जानने की इच्छा या उत्कंठा होती हैं जिसे कभी न जाना हो। उत्सुकता मन और आत्मा में एक मिठास जगाती हैं।

उत्सुकता भविष्य के बारें में जानने की भावना होती हैं। जानना और महसूस करने की भावना को उत्सुकता कहा जा सकता हैं।


अनजानी चीज़ को जानने की चाह रखना उत्सुकता ही तो हैं। उत्सुकता में मिठास होती हैं। उत्सुकता मीठी लगती हैं। भविष्य में होनें वालें परिणामों को जानने की इच्छा उत्सुकता कहलाती हैं।


उत्सुकता परिणामों पर निर्भर करती हैं। अगर परिणाम शीघ्र ही दिखनें या समज में आने वालें हो तो उत्सुकता की मिठास भी उतनी ही होती हैं।


उत्सुकता एक मीठी भावना होती हैं।



उत्सुकता.... जानने की आंस.....

Saturday, July 4, 2009



आँसूं....



आँसूं .... भावनाओं के दर्पण होतें हैं। मन के विचारों के प्रतिक होतें हैं। आँसूं इच्छाओं के प्रतिबिंब होतें हैं।


आँसूंओ की भाषा हर कोई नहीं समज़ पाता। ये तो आत्मा की प्रतिमा होतें हैं।

आँसूं तो आत्मा की भाषा होतें हैं। आँसूं तो मन और आत्मा की भाषा कहतें हैं। आँसूं विचारों के प्रतिक होतें हैं। आँसूं मन के दर्पण हो सकते हैं ? जी हाँ, आँसूं तो मन और आत्मा दोनों के दर्पण होतें हैं।


आँसूं एक भाषा होतें हैं और ये भाषा अपने आप पढ़ी जाती हैं। आँसूंओ की भाषा तो मन की भाषा पढ़ने वाले सहज रूप से पढ़ सकतें हैं।


आँसूं हमें और हमारें विचारों को प्रकट करतें हैं।


आँसूंओ का होना भावनाओं के अस्तित्व का प्रतिक हैं।



आँसूं..... मन और आत्मा के प्रतिबिंब.....

Thursday, July 2, 2009


मन के आभूषण....



मन के आभूषण.... आदर,संकोच,निर्मलता,निर्भयता,अपनापन,लज्जा,मिठास... यह सब मन के अलौकिक आभूषण हैं।


मन एक अपनी ही ईच्छा से चलने वाला राजा और इस राजा के ऊपर लिखित सभी अमूल्य आभूषण होते है। इन अलौकिक आभूषणों के बिना तो मन की शोभा ही नही बढ़ती ऊपर लिखित सभी आभूषणों के अपने अपने अमूल्य गुन होते हैं। यह सभी आभूषण मन रूपी राजा की शोभा बढ़ाते हैं।


एक राजा जो अपने आभूषणों के बिना हमेशा अधुरा सा लगता हैं। पर आभूषण ही उसे पूर्णत्व दिलाते हैं। राजा तभी राजा कहलाता हैं जब उस में राजा जैसे गुन हो। आभूषण तो बस राजा की शोभा बढाते हैं। अगर मन रूपी राजा के पास ये अमूल्य आभूषण न हो तो मन रूपी राजा की शोभा कैसे बढेगी ?


मन के आभूषण हमेशा अमूल्य होते हैं।


"लज्जा" मन का सबसे महत्वपूर्ण आभूषण.....

Wednesday, July 1, 2009


कोशिश.....


किसी चीज़ को पाने की चाहत होना किंतु उसे न हासिल कर पाना फिर भी दृढ़ इच्छा से उसे पाने का प्रयास करना "कोशिश" कहलाती हैं।


"कोशिश"... किसी चीज़ के आवश्यक होने पर न हासिल कर पाना.. फिर भी उसे हासिल करने की चाह रखना या उस चीज़ को पाना आवश्यक बन जाना और उस लिए आवश्यक कदम बढ़ाना "कोशिश" कहलाती हैं।


"कोशिश" यह एक दृढ़ निष्ठां के प्रति बढाया हुआ साहसी कदम होता हैं। इस प्रयास में "आवश्यकता" लक्ष्य होती हैं, एक मज़बूत आधार होती हैं। "कोशिश" प्रामाणिकता का प्रमाण होती हैं।


किसी चीज़ का अत्यंत आवश्यक बन जाना और उसे पानी के प्रती आवश्यक कदम उठाना "कोशिश" ही तो हैं।


"चाह" ही तो "कोशिश" को आगे बढाती हैं। बिना चाहत या आवश्यकता के "कोशिश" के प्रती कदम उठाया ही नहीं जा सकता।


जब बिना चाहत या आवश्यकता के "कोशिश" की जाए तो वह

"निष्पाप कर्म" कहलाता हैं।



कोशिश... किसी को पाने के प्रती उठाया हुआ पहला कदम.....


Tuesday, June 30, 2009


खालीपन......




खालीपन नया काम शुरू करने का शुभ मुहूर्त होता हैं। खालीपन किसी काम के ख़त्म होने की और किसी नये काम के शुरू होने की निशानी होती हैं।



खालीपन मन को तरो ताज़ा करने का एक अच्छा समय होता है। एक मात्रा तक खालीपन मन और आत्मा को शांती प्रदान कर सकता हैं। यह वही समय होता है जब किसी अच्छे विचार और अच्छी शुरुवात करने का प्रारम्भ किया जा सकता हैं।




मन पर जो बोज़ होता है वह खालीपन में दूर किया जा सकता हैं। खालीपन में नये विचारों पर सोचा जा सकता हैं। खालीपन में भूतकाल में की गई त्रुटियों पर विचार किया जा सकता हैं। खालीपन मन को नई दिशा दे सकता है। यह वही समय होता है जिससे एक नई शुरुवात की जा सकती है। कुछ लोग खालीपन को सोना (गोल्ड) मानते हैं।




नये विचारों और नई शुरुवात का शुभ मुहूर्त होता हैं खालीपन। खालीपन जिन्दगी की नई शुरुवात हो सकती हैं। खालीपन एक नया मौका हो सकता हैं।





खालीपन एक नई शुरुवात..........




Monday, June 29, 2009




लोकप्रियता.....


कला के परिपक्व होने को लोकप्रियता कहा जा सकता हैं।


कला.... एक इच्छा और उमंग के साथ बनती तथा सवरती हैं।

कला को आत्म-इच्छा और रूचि से बनाया तथा मेहनत के धागे में पिरोया जा सकता हैं। इसे सिर्फ़ आत्म-इच्छा से आगे बढाया जा सकता हैं। लोकप्रियता.... कला के अन्तिम छोर का चरम बिन्दु होती हैं।


लोकप्रियता.... कला के परिपक्वता का ही परिणाम हैं। कला में आत्मा को ढूंढने वालों को लोकप्रियता से कोई वास्ता नही लगता और नाही उन्हें कोई लगाव होता है। ये तो बस आत्मा की तृप्ति के लिए बनाई और सवारी जाती है।


लोकप्रियता... कला के परिपक्वता का एक मीठा फल है जिसे कला को सवारने वाले कभी खाने की इच्छा नही करते। वे तो इसे कला के लिए की गई मेहनत के पेड़ का फूल समजते हैं जिसे सिर्फ़ देखा और निहारा जा सकता हैं।


कला तो आत्मा का दर्पण होती हैं। यह तो बस अपने आप आत्मा के धुन में रंग जाती है और बनती सवरती रहती है। यह लगन बढाती हैं। लगन तो आत्मा के अनुकूल होने पर ही अपने आप बनती तथा बदती हैं।



कला...... आत्मा की धुंद

Saturday, June 27, 2009



नज़र



नज़र.... एक मन का दर्पण। अपने मन का संभाषण अपनी नज़र से कहा या व्यक्त किया जाता है।

अपने मन के हर भाव को नज़र के द्वारा प्रकट किया जा सकता है।

नज़र किसी के दिल तक पहुँचने का एक जरिया है। कहते है की दिल भाषा आंखों से और आंखों की भाषा दिल से पढ़ी या जानी जा सकती है।



किसी के मन की बात पढ़नी हो तो सिर्फ़ उनकी आंखों में देख लो.... मन की बाअपने आप समज में आ जाएगी। कोई चाहे कितनी भी कोशिश करे पर अपने दिल की बात को अपनी आखों से, अपनी नज़र से नहीं छुपा सकतें।



नज़र हमेशा सच कहती है। यह एक ही बात या चीज है जो सिर्फ़ सच कहना जानती है। नज़र पर कभी किसी का ज़ोर नहीं चलता। ये तो बस हमेशा दिल का दर्पण बयां करती है। नज़र का रास्ता सीधा दिल तक जाता है, यानी किसी के दिल को जानना हो तो सिर्फ़ उनकी नज़र से नज़र मिला लीजिए, सब बातें अपने आप समाज में जाएंगी।



नज़र एक मन की परिभाषा होती है।


नज़र... दिल तक ले जाने वाला सीधा रास्ता.....